भारत एक कृषि प्रधान देश है. आज भी टोटल वर्कफोर्स और देश के जीडीपी में कृषि क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान है. कृषि क्षेत्र भारत में लगभग 45 परसेंट वर्कफोर्स को रोजगार प्रदान करता है. अगर जीडीपी (GDP) की बात करें तो कृषि क्षेत्र का योगदान लगभग 15 परेंट टोटल जीडीपी (GDP) का है. समय के साथ तकनीकी क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है, इसके साथ ही साथ कृषि क्षेत्र भी इस प्रगति से अछुता नहीं है. कृषि क्षेत्र में तकनीकी के प्रगति के बावजूद, भारत में उपज में भारी अंतर है. खासकर चावल और गेहूं जैसी प्रमुख फसलों का उत्पादन स्तर उनकी क्षमता से कहीं कम है. हाल ही में एआई(ARTIFICIAL INTELLIGENCE) तकनीक इस मुद्दे के लिए एक अनोखा समाधान के रुप में उभर रही है. आपको बता दें कि एआई (AI) डाटा संचालित गहरी समझ प्रदान करती है जो खेती के तरीके को बदल सकती है.
एआई (AI) के जरिए ऐसे बदलेगी कृषि की तसवीर-
एआई खेती के विभिन्न चरणों में समाधान प्रदान करती है. बुवाई से पहले के चरण में एआई मिट्टी के हेल्थ का आकलन कर सकता है. एआई के जरिए जलवायु के अनुकूल फसल की परख अच्छे तरीके से की जा सकती है. जिससे सफल फसल की संभावना बढ़ जाती है. वहीं खेती के दौरान एआई के उपयोग की बात करें तो , एआई संचालित सेंसर और ड्रोन पौधों के स्वास्थय की निगरानी करते हैं, जिससे फसलों में रोगों का सटीक प्रबंधन, खाद का मात्रा और पानी जैसे संसाधनों का परफेक्ट उपयोग संभव होता है. ये तकनीक न केवल उत्पादकता बढ़ाते हैं, बल्कि कचरे के प्रबंधन और खेतों में परफेक्ट इनपुट की जानकारी देता है ताकि खेती टिकाऊ हो पाए.
भारत सरकार की डिजिटल कृषि मिशन (2021-2025)-
इस मिशन के माध्यम से कृषि में एआई को सक्रिय रुप से बढ़ावा दी जा रही है. यह पहल डेटा संचालित खेती के एक प्रमुख प्रवर्तक के रुप में एआई की भूमिका पर प्रकाश डालती है, जौ मौजूदा कृषि ढ़ाचें में एआई को एकीकृत करने के लिए पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) को प्रोत्साहित करती है. हालांकि इस मिशन को व्यापक रुप में अपनाने में कई चुनौतियां है. एक बड़ी चुनौती डेटा की उपलब्धता और क्वालिटी है. एआई मॉडल के लिए मजबूत डेटा सेट की आवश्यकता होती है, फिर भी भारत के खेत-स्तर के डेटा में अक्सर स्पष्टता की अभाव दिखती है. इसके अलावा अपर्याप्त डिजिटल बुनियादी ढांचा, जैसे खराब इंटरनेट कनेक्टिविटी और कम स्मार्टफोन पैठ, स्केलेबिलिटी को बाधित करता है. बाते दें कि ग्रामीण क्षेत्रों में एआई तकनीकों का बेहतर इस्तेमाल तब ही हो पाएगा जब बुनियादी ढांचे की चुनौतियों का समाधान किया जाए.
क्या कहते हैं विशेषज्ञ-
विशेषज्ञ बताते हैं कि लागत एक बड़ी बाधा है, कई छोटे किसान सब्सिडी के बिना एआई उपकरण खरीदने में असमर्थ हैं. इसके अलावा किसानों को परफेक्ट प्रशिक्षण के अभाव में एआई आधारित कृषि तकनीक में विश्वास कम है. इस विश्वास को बढ़ाने के लिए जानकार पारदर्शी संचार और स्थानीय भाषा में संचार को एक बेहतर टूल के रुप में देखते हैं.
एआई का परफेक्ट इस्तेमाल पर जानकार बताते हैं कि ओपन-सोर्स एग्री- डेटा प्लेटफार्म में निवेश और ग्रामिण डिजिटल बुनियादी ढ़ांचे को दुरुस्त करने से ही बात बनेगी.
छोटे किसान तक एआई मॉडल की उपयोगिता पर जानकार बताते हैं कि सहकारी समितियां (COOPERATIVE SOCIETIES) या किसान उत्पादक संगठनों (FPO) के माध्यम से छोटे किसानों तक एआई टूल्स की पहुंच में सुधार हो सकता है. टेक्नोलोजी अपनाने में सुविधा के लिए एफपीओ को प्रशिक्षित करने से एआई की पहुंच को बढ़ावा दे सकता है.
आपको बता दें कि उपज का अंतर एक कठिन चुनौती है, प्रौद्दोगिकी, नीति और सहयोग का सही मेल से भारत में कृषि उत्पादकता बढ़ सकती है. नवाचार को बढ़ावा देने और मौजूदा बाधाओं को दूर करने के माध्यम से, एआई भारतीय कृषि को जबर्दस्त तरीके से बदलने में महत्वपूर्ण योगदान निभा सकता है.