यह कहा गया है — जो समाज या राष्ट्र ज्ञान का अपमान करती है, वह धीरे-धीरे खंडहर में बदल जाती है. इतिहास इसका साक्षी है. कभी बिहार की यह पवित्र धरती नालंदा और विक्रमशिला जैसे महान विश्वविद्यालयों के माध्यम से पूरे विश्व को दिशा देती थी. यह धरती वह थी, जहाँ से ज्ञान, करुणा और मानवता की ज्योति पूरे संसार में फैली थी.
लेकिन समय के एक अमानवीय दौर में बर्बरता ने इस ज्ञानदीप को बुझा दिया. नालंदा और विक्रमशिला की वह गौरवशाली विरासत राख में बदल गई. और उसके साथ मिट गया वह ज्ञान-संस्कार, जिसने भारत को “विश्वगुरु” बनाया था.
फिर भी, इतने वर्षों बाद भी हमने उस बर्बरता का प्रतिशोध नहीं लिया — प्रतिशोध शिक्षा से, पुनर्निर्माण से, पुनरुद्धार से.
अब यह हमारी भूमि के लोगों का कर्तव्य है कि वे आगे आएँ और विक्रमशिला विश्वविद्यालय को फिर से स्थापित करें. हमें भारत की उस प्राचीन ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित करना होगा, जिससे यह धरती फिर एक बार विश्व को संकटों से बाहर निकालने का मार्ग दिखा सके.
ख़बर वाटिका इस दिशा में अपना दायित्व निभाते हुए विक्रमशिला पर एक श्रृंखला प्रकाशित करेगा — जिसमें उसके इतिहास, दर्शन और पुनर्निर्माण की आवश्यकता पर विस्तार से चर्चा की जाएगी.
इन आलेखों को संबंधित अधिकारियों तक भी पहुँचाया जाएगा, ताकि इस महान धरोहर के पुनर्जीवन का कार्य तेजी से आगे बढ़ सके.
ख़बर वाटिका इस पवित्र उद्देश्य के प्रति संकल्पबद्ध है कि वह भारत की प्राचीन ज्ञान प्रणाली को पुनर्जीवित करने के प्रयासों में अपना सर्वोत्तम योगदान देगा — ताकि एक बार फिर यह पवित्र भूमि ज्ञान की ज्योति से समूचे विश्व को आलोकित कर सके.