मूंगेर जिला के तारापुर क्षेत्र जो कि खेती किसानी के लिए उन्नत क्षेत्र के रुप में जाना जाता है विभिन्न संकटों से गुजर रहा है. क्षेत्र के किसान मु्ख्य रुप से दो संकटों का सामना कर रहे हैं. पहला संकट तो मौसम का संकट है. खेती के अनुकूल मौसम न होने के कारण फसल बर्बाद हो रहे हैं और खासकर धान की फसलों में मधुआ रोग के प्रकोप से किसान परेशान हैं. वहीं दूसरी ओर क्षेत्र में खेतिहर मजदूर की कमी है. बता दें कि क्षेत्र में रोजगार के अभाव में मजदूर लोग दूसरे प्रदेश में रोजगार की तलाश में जाने के लिए अभिशप्त हैं. हालांकि क्षेत्र में अब तक रबी की बुवाई प्रारंभ नहीं हुई है. किसानों का कहना है कि पहले धान कटनी अच्छे से कर लें फिर उसके बाद रबी की बुवाई करेंगे.
नहीं मिल रहे खेतिहर मजदूर
पलायन के संदर्भ में बहुत सारी धारणाएं हैं. कोई पलायन को बेहतर संभावनाओं की तलाश बताता है, तो कोई इसे मजबूरी बताता है. हालांकि बिहार जैसे राज्य के लिए पलायन अधिकांश संदर्भों में मजबूरी है. लोग अपने गांव-घर छोड़कर जाने के लिए अभिशप्त हैं. कोई पढ़ाई के लिए पलायन कर रहा हैं तो कोई नौकरी के लिए. पलायन का सबसे प्रतिकूल प्रभाव सबसे ज्यादा मजदूरों पर पड़ता है. बता दें कि काफी संख्यां में मजदूर लोग राज्य से पलायन कर रहे हैं. यही कारण है कि तारापुर क्षेत्र के किसान को किसान को धान काटने के लिए मजदूर नहीं मिल रहे हैं. मजदूर नहीं मिलने के कारण क्षेत्र में 50 परसेंट से अधिक किसान धान कटनी शुरु नहीं कर पाए हैं. बता दें कि छठ महापर्व और चुनाव के बाद काफी संख्या में मजदूर रोजी-रोजगार के तलाश में दिल्ली, मुंबई, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान आदि प्रदेशों के लिए जा रहे हैं. एक किसान का कहना है कि क्षेत्र में मजदूर नहीं मिलने के कारण आसपास के क्षेत्र जैसे कटोरिया, चादंन, जमुई के लक्ष्मीपुर, झाझा एवं दिघी जैसे आदिवासी इलाके अपना किराया खर्च बड़ी मुश्किल से मजदूरों को धान की कटनी के लिए और रबी की बुवाई के लिए लाया जा रहा है.
क्या कहते हैं किसान
यहां के किसानों में जितेन्द्र कुशवाहा, बिहारी लाल कुशवाहा, कर्मवीर भारती एवं विजय यादव ने खबर वाटिका को बताया कि अनुमंडल क्षेत्र के सभी 3 प्रखंडों को मिलाकर लगभग 12 हजार हेक्टेयर से अधिक जमीन में विभिन्न प्रकार के रबी फसल की खेती होने की संभावना है. आगे उन्होंने बताया कि अभी तक धान कटनी काम में देरी के कारण रबी की फसल की बुवाई नहीं हो पाई है. हालांकि उन्होंने ने यह भी बताया की रबी की बुवाई के लिए 15 दिसंबर तक के समय को काफी उपयुक्त माना जाता है. क्षेत्र में रबी की फसल से जैसे गेहूं, चना, रैंचा, मसूर, सरसों, धनिया आदि प्रजूर मात्रा में उगाए जाते हैं. बता दें कि क्षेत्र में मजदूर न मिलने के कारण धान की कटनी का काम अभी तक नहीं हो पाया है. वहीं दूसरी ओर मधुआ बीमारी के कारण भी धान फसल बर्बाद हो रही है. और यही कारण है कि रबी की बुवाई में देरी हो रही है.
कृषि विभाग से नाराज हैं किसान
कुछ किसानों ने खबर वाटिका से बताया कि जब धान की फसल पूरी तरह से बर्बाद होने के कगार पर पहुंचती है तो कृषि विभाग धान काटने वाली मशीन क्षेत्र में लाती है. वहीं प्रखंड कृषि समन्वयक मनोज कपरी का कहना है कि धान कटनी के लिए मशीन कृषि विभाग के पास नहीं होती है, बल्कि कृषि विभाग अनुदान राशि पर किसानों को धान काटने वाली मशीन उपलब्ध कराती है.