आज का चुनाव विभिन्न परिपेक्ष्य में

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लोकतंत्र का आधार चुनाव.

मैने कभी अपने जीवन में वोट नहीं किया है. मैने हमेशा से जाना और समझा कि बेवकूफ अधिक संख्या में है इसलिए ये निश्चित है वे जीतेंगे.

I have never voted in my life, I have always known and understood that idiots are in a majority so it’s certain they will win-Louis Ferdinand
आजकल जहां भी जाइए जिधर भी जाइए सबकी मुहवा पे एक ही शब्द सुनाई देगी चुनाव चुनाव चुनाव . सबसे पहले हमें ये समझना होगा कि ये चुनाव क्या है ? ये भी समझना होगा कि चुनाव क्यों जरूरी है ? चुनाव में कौन-कौन भाग ले सकता है? भारत में चुनाव कौन करवाता है और उसकी क्या भूमिका है ? आज का चुनाव कैसे बदलता जा रहा है ? एक-एक कर इन सभी प्रश्नों का उत्तर जानने का प्रयास करते है.

चुनाव गणतंत्रीय शासन प्रणाली की एक प्रमुख विशेषता है. जिस देश में तानाशाही शासन होता है उस देश में अपना मत देने का अधिकार ही नहीं होता ,तानाशाह की इच्छा ही सबकुछ होती है. उसमें जनता के विचार का कोई महत्व नहीं होता.
अब्राहम लिंकन ने गणतंत्र की परिभाषा इस प्रकार की है – गणतंत्र जनता के द्वारा जनता के लिए जनता का राज्य है. ( Democracy is government of the people , by the people and for the people.) अतः गणतंत्र में यह आवश्यक है कि देश के शासन का संचालन वहां की जनता की इच्छा पर हो . इसके लिए निर्वाचन/ चुनाव की पद्धति अपनाई जाती है. आज विधानसभा हो या लोकसभा, सभी के लिए प्रत्याशियों का चुनाव एकमात्र मार्ग बन गया है.

वर्तमान काल में सभी गणतांत्रिक राज्यों ने व्यस्कमताधिकार के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया है. इस सिद्धांत के अनुसार हमारे देश के भी सभी वयस्क ( जिनकी न्यूनतम आयु 18 वर्ष हो ) चाहे वो स्त्री हो या पुरुष , धनी हो या निर्धन मत देने के अधिकारी है.

भारत के संविधान में एक निर्वाचन आयोग ( अनुच्छेद ३२४- ३२९ ) का प्रावधान है जो सभी चुनावों के निरीक्षण , निर्देशन और नियंत्रण के लिए उत्तरदायी है. यह संसद के दोनों सदनों , विधान सभाओं तथा राष्ट्रपति एवम् उप-राष्ट्रपति पद के चुनावों के लिए उत्तरदायी है. इसके अतिरिक्त यह मतदान सूचियां बनाने उन्हें संशोधित करने तथा मतदाता सूचियों के रख रखाव के लिए भी उत्तरदायी है . यह संसद और राज्य विधान सभाओं के लिए चुनावी क्षेत्र परिसीमित करता है , चुनावी कार्यक्रम निर्धारित करता है और चुनावी विवाद सुलझाता है. यह चुनाव से सम्बन्धित अनेक अन्य कार्य भी करता है.


हालांकि चुनाव आयोग एक स्वतंत्र मशीनरी है फिर भी आजकल इसके कार्यकलाप पे प्रश्न चिह्न उठता रहता है. उदाहरण के लिए : कुछ दिन पहले बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले निर्वाचन नामावली का विशेष गहन पुनरीक्षण किया गया जिसमें ये आरोप लगा कि कई सारे मतदाताओं का नाम मतदाता गणना से हटा दिया गया. लोकसभा में नेता विपक्ष और रायबरेली से कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर पिछले कुछ चुनावों में धांधली होने का बड़ा आरोप लगाया. उन्होंने महाराष्ट्र, कर्नाटक समेत कई राज्यों की कथित वोटर लिस्ट दिखाई जिसमें एक ही पते पर कई नाम दर्ज थे. उन्होंने वोटर लिस्ट दिखाई जिसमें कई वोटरों के मकान नंबर शून्य लिखा था और पिता का नाम भी गलत था. एक वोटर में पिता का नाम- ‘dfojgaidf’ दिया गया था. हाल ही में बिहार विधानसभा चुनाव संपन्न हुए . इस चुनाव के दौरान भी चुनाव आयोग पे आरोप लगा कि आचार संहिता के दौरान एक उम्मीदवार 40-40 गाड़िया लेकर चुनाव प्रचार करता हुआ दिखा पर चुनाव आयोग के द्वारा कोई त्वरित करवाई नहीं करते हुए दिखी. आचार संहिता के दौरान ही बिहार विधानसभा चुनाव में सरकारी योजना के नाम पे दस दस हजार रूपये दिए गए . स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार बिहार विधानसभा चुनाव में आचार संहिता के दौरान लोगों को पैसे भेजे गए .

यदि हम आज अपने देश के चुनाव पद्धति के प्रति ध्यान दे तो घृणा होने लगती है. जिनके पास पैसे और लाठियां है उनसे ये चुनावयुद्ध में जितना बड़ा कठिन हो जाता है. आज इसी तरह के लोग जो जीत कर जाते है वो अन्याय का नग्न नृत्य करते है . उर्दू में महाकवि इकबाल ने लिखा है –
जमहूरियत वह तर्जे हुकूमत है कि जिसमें,
वन्दे को गिना करते है, तौला नहीं करते.

प्रजातंत्र में हर मनुष्य का मोल बराबर है – चाहे वो पंडित हो या मूर्ख , धनवान हो या गरीब, विचारवान हो या विचारशून्य, पैसे पर बिकनेवाला हो या पूरा ईमानदार. इसमें केवल माथा गिन लिया जाता है किंतु आज यह भी स्थिति खतरे में है.

हरिभाऊ उपाध्याय ने कभी कहा था चुनाव युद्ध नहीं तीर्थ है , पर्व है – यह पानीपत नहीं , कुरुक्षेत्र नहीं यह प्रयाग है , त्रिवेणी है , संगम है , कुंभ है ,महाकुंभ है. लेकिन यदि आज की चुनाव लीला को देखी जाए तो ये मनुष्य को पशु बनाने की रसायनशाला है. यदि यही स्थिति बनी रही तो भारत में गणतंत्र का भविष्य खतरे में पड़ सकता है.

साथियों आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के हैं. खबर वाटिका ने सिर्फ संपादन किया है. आलेख को लिखा है हमारे साथी मनीष कुमार सिंह ने.

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