देवघरा की दिव्य धरा : ऊंचेश्वर नाथ महादेव के सान्निध्य में आस्था, इतिहास और प्रकृति का अद्भुत संगम

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प्राकृतिक सौंदर्य से आच्छादित ऊंचेश्वरनाथ महादेव का मंदिर. फोटो क्रेडिट- रणधीर सिंह.

देवघरा- एक ऐसा पवित्र स्थल, जहां पहाड़ों की चोटी पर टहलती हवा भी मानो अपने भीतर शिवत्व की अनुगूँज समेटे चलती है. मूंगेर जिला के तारापुर विधानसभा क्षेत्र के संग्रामपुर–गंगटा मुख्य मार्ग पर स्थित यह धरा न केवल प्राकृतिक सौंदर्य से आच्छादित है, बल्कि अपने भीतर सदियों पुराना इतिहास, पौराणिक प्रसंग और मानवीय आस्था की अनगिनत किवदंतियां भी समेटे हुए है. बता दें कि देवाधिदेव महादेव के इस प्रसिद्ध तीर्थस्थल पर प्रतिदिन दूर-दूर से श्रद्धालु अपने पूरे परिवार के साथ पहुंचते हैं, जलाभिषेक करते हैं और भक्ति-भाव में डूबकर प्रार्थना करते हैं.

आस्था के अमृत में डूबा देवघरा का आश्चर्यलोक

पराभौतिक शक्तियों के प्रति आस्था के कारण ही भारत की धरती अनोखी है. यही कारण है कि भारत के कोने-कोने में ऐसी कई जगह मिल जाएंगी जो कि इसी के संकेत देते हैं. आखिरकार मंदिर का निर्माण हो या पूजा अर्चना की खास विधि हो ये उसी परमशक्ति के प्रति आस्था और आदर का ही तो सूचक है. आपको बता दें कि जैसे ही कोई श्रद्धालु देवघरा की इस पवित्र स्थल की सीमा में प्रवेश करता है, उसे लगता है कि वह किसी स्वप्नलोक में आ गया है- जहां पहाड़ों की ऊँचाइयों पर गूंजते मंत्र, हवा में बिखरी धूप की किरणें और शांति से ओत-प्रोत वातावरण उसे एक दिव्य अनुभूति प्रदान करते हैं. मंदिर की बात करें तो ऊंचेश्वर नाथ महादेव मंदिर चोटी पर अवस्थित है, और नीचे शिवगंगा की पवित्र धारा बहती है जो एक सुरम्य प्राकृतिक वातावरण का निर्माण करती है जो की अत्यंत ही रमणीय और मोहक है. लोक संस्कृति के अनुसार ऐसा माना जाता है कि शिवगंगा के जल में स्नान कर माथे पर उसकी पवित्र मिट्टी लगाना यहां आने वाले हर श्रद्धालु के लिए सौभाग्य की बात होती है. इस स्थल का आकर्षण इतना प्रभावी है कि सैकड़ों छोटे-बड़े वाहन प्रतिदिन यहां आते दिखाई देते हैं. परिवारों के साथ आए लोग महादेव के चरणों में प्रसाद चढ़ाते, जलाभिषेक करते और फिर शांत मन से बैठकर प्रकृति की गोद में अध्यात्म का अनुभव करते हैं.

पौराणिक कथाओं की अनुगूँज- जहां अर्जुन ने पाया दिव्य गांडीव

देवघरा का स्थल अपने आप में इतिहास समेटे हुए है. बता दें कि पौराणिक कथाओं में इसका विशेष महत्व बताया गया है. कहा जाता है कि इसी सिद्ध–पीठ पर महाबली अर्जुन ने कठोर तपस्या की थी. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवाधिदेव महादेव ने उन्हें दिव्य गांडीव धनुष प्रदान किया. जिस दिन महादेव ने अर्जुन को यह वरदान दिया, उसी दिन से यह स्थल ऊंचेश्वर नाथ महादेव के नाम से प्रसिद्ध हो गया. कालान्तर में इस क्षेत्र को देवघरा नाम मिला- एक ऐसा स्थान जहां देवत्व हर ओर बिखरा हुआ प्रतीत होता है.

मुखिया सुरेश यादव लोक कथाओं का संदर्भ देते हुए बताते हैं कि इस ऐतिहासिक धरा पर गौतम, कणाद, बहुलाश्र, अयामी और विदेहराज जनक जैसे अनेक महापुरुषों ने तपस्या कर महादेव से वरदान पाया. निस्संदेह यह स्थान केवल भक्ति का ही नहीं, बल्कि भारतीय अध्यात्म और दर्शन का भी गौरवशाली केंद्र रहा है.

गुफानुमा घाटियाँ और प्रकृति की अद्भुत चित्रकला

देवघरा की भूमि प्राकृतिक रूप से अति सुरम्य है. पहाड़ों के बीच स्थित यह स्थल मानो किसी रोमैंटिक चित्रकार की कलात्मक रचना हो—जहां शिलाखंड, हरियाली, पतली पगडंडियाँ और गुफाओं जैसी घाटियाँ मन को मोह लेती हैं. सुबह की पहली किरण जब मंदिर की चोटी पर पड़ती है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं प्रकृति सूरज की किरणों से महादेव का अभिषेक कर रही हो. यहां रुककर ध्यान लगाना, प्रकृति की ध्वनियों को सुनना और पहाड़ी हवाओं को महसूस करना किसी भी साधक को आध्यात्मिक ऊँचाइयों तक ले जाता है. यही कारण है कि वर्षों से साधक, तपस्वी और भक्त यहां आकर आत्मिक शांति का अनुभव करते रहे हैं.

सावन में उमड़ती भक्ति की गंगा

मंदिर के मुख्य पुजारी सुधीर दास बताते हैं कि सावन का महीना आते ही यहां भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है. हर रोज जलाभिषेक के लिए लंबी कतारें लगती हैं. शाम ढलने के बाद होने वाली महाआरती का अलौकिक नजारा भक्तों के मन में गहरी छाप छोड़ जाता है. ढोल–दमाऊं की धुन, घंटियों की झंकार और ‘हर-हर महादेव’ के जयकारों से पूरा वातावरण गुंजायमान हो उठता है.

सावन की हर शाम मानो एक नया पर्व होती है—जहां श्रद्धालु अपने मन की बातें महादेव से कहते हैं, अपनी पीड़ाएँ उन पर अर्पित करते हैं और मनोकामनाओं के पूर्ण होने की आशा से लौटते हैं.

विकास की प्रतीक्षा में पौराणिक धरोहर

इतिहास, प्रकृति और आस्था का यह अनूठा संगम आज भी अपने समुचित विकास की प्रतीक्षा कर रहा है. यह स्थल जितना महत्वपूर्ण धार्मिक दृष्टि से है, उतना ही पर्यटन के क्षेत्र में भी अपार संभावनाओं से भरा है. यदि इसे उचित संरक्षण और विकास मिले, तो यह न केवल बिहार बल्कि पूरे देश की आस्था और आध्यात्मिक पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन सकता है. बता दें कि बिहार जैसे राज्य जो कि ज्ञान और अध्यात्म की भूमि है, जहां सैकड़ों ऐसे स्थल मौजूद हैं जहां आध्यात्मिक पर्यटन को बढ़ावा दिया जाए तो राज्य के लोगों के लिए स्वरोजगार के कुछ बेहतरीन अवसर बन सकते हैं.खबर वाटिका सरकार और पर्टन से जुड़े लोगों से आग्रह करता है कि हम लोग साथ आकर इस क्षेत्र के उन्नयन की ओर ध्यान दें.

देवघरा- जहां हर पत्थर, हर पगडंडी शिव नाम का जप करती है

देवघरा की धरा पर चलते हुए लगता है कि यहां का हर कण शिवमय है. पहाड़ों की नीरवता, मंदिर की घंटियाँ, गुफाओं की रहस्यमयी प्रतिध्वनि और शिवगंगा का कलकल प्रवाह—सब मिलकर ऐसी अनुभूति प्रदान करते हैं जो साधारण जीवन में दुर्लभ है. आस्था, अध्यात्म और इतिहास के अनोखे सम्मिश्रण ने देवधरा को केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि एक अद्भुत आध्यात्मिक धरोहर बना दिया है. यहां आना, कुछ पलों के लिए ठहरना और स्वयं को शिवचरणों में समर्पित कर देना—हर मन को नया जीवन, नई ऊर्जा और नया विश्वास प्रदान कर देता है.

देवघरा सचमुच वह पवित्र धरा है जहां मन खाली होकर नहीं लौटता—जहां हर श्रद्धालु अपने भीतर शिवत्व की एक नई लौ प्रज्वलित कर घर लौटता है.

साथियों आपको बता दें कि इस आलेख को तैयार करने में खबर वाटिका के साथी रणधीर सिंह का योगदान है.

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