वैज्ञानिक बोलें केवल तकनीक नहीं, किसान और आमजन की आपसी सहयोग से बचेगा जल-

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हरी-भरी धान की खेत.

जैसे की हम जानते हैं कि वर्तमान दौर की सबसे बड़ी समस्या जलवायु परिवर्तन है. जलवायु परिवर्तन के कारण हमें कई सारी समस्याओं का सामना कर पड़ रहा है. इन संकटों में आमतौर पर वायु प्रदूषण, जलप्रदूषण, मिट्टी प्रदषण, मौसम का अपने स्वभाव के विपरीत परिवर्तन होना आदि शामिल हैं. लेकिन इनके अलावा जलवायु परिवर्तन के कारण जो दूसरा संकट उत्पन्न हुआ है वह जल की उपलब्धता की. भूजल में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है. खासकर भारत जैसे बड़े जनसंख्या वाले देश जहां भूजल का सर्वाधिक उपयोग होता है. जल संकट और संरक्षण पर हाल ही में कई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक नागालैंड विश्विद्दालय के नेतृत्व में किए गए एक वैश्विक अध्धयन से ये पता चला कि जल संरक्षण की उन्नत तकनीकें तब तक असर नहीं दिखा सकती, जब तक उन्हें स्थानीय समुदाय, आमजन और किसान न अपनाएं. भारत जैसे कृषि प्रधान देश में जल की उपयोगिता बहुत महत्तवपूर्ण स्थान रखती है .इसिलिए इस खबर में हम आपको रिसर्च की मुख्य बातें आसान शब्दों में बताने जा रहे हैं.

रिसर्च मंथन में क्या मिला –

प्रो. प्रभाकर के नेतृत्व में किया गया यह बहु उद्देश्य अध्धयन से साबित हुआ कि एक्विफर रीचार्ज एंड रिकवरी जैसी तकनीकें तब ही काम करती है, जब इसका जिम्मेदारीपूर्वक इस्तेमाल हो. आपको बता दें कि प्रो. प्रभाकर शर्मा के साथ स्पेन, जापान और भारत के विशेषज्ञ शामिल थें. यह शोध सोसाइटल इंपैक्ट्स जर्नल में पब्लिश हुआ है. आपको बता दें कि रिसर्च के दौरान साउथ बिहार के नालंदा जिले के मेयर और नेकपुर गांवों में एएसआर तकनीक का पायलट परीक्षण किया गया. इन गांवों में वर्षा जल को जमीन के भीतर पहुंचाने के लिए रिचार्ज पिट्स बनाए गए. जहां मेयर गांव के किसानों ने इन संरचानाओं की नियमित देखभाल की, वहां सिंचाई व्यवस्था में सुधार, अतिरिक्त फसलें और बेहतर आमदनी देखने को मिली. वहीं नेकपूर गांव में किसानों की अनिच्छा और संदेह के चलते संरचाएं बेकार पड़ी रहीं. यही फर्क दिखाता है कि तकनीक की सफलता लोगों की सहभागिता पर निर्भर करता है.

क्या कीमत है रीचार्ज पिट की?

रिसर्च में बताया गया कि एक रिचार्ज पीट की लागत लगभग 33,000 से 35,000 रुपए में आती है, जो पारंपरिक बोरवेल से बहुत ज्यादा सस्ता है. विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि नीतिगत स्तर पर शुरुआत मध्यम और बड़े किसानों से की जाए ताकि सामूहिक जिम्मेदारी का माहौल बन सके.

देसी तकनीक इस्तेमाल कर महिलाएं बनीं प्रेरणा-

रिसर्च में देसी तकनीक और महिलाओं का भी जिक्र किया गया है. रिसर्च में भुंगरू नामक देसी तकनीक का जिक्र किया गया है जो खास तौर पर गुजरात में विकसीत हुई है. भुंगरू एक देसी तकनीक है जिसमें बारिश के समय खेतों में जमा अतिरिक्त पानी को जमीन के भीतर भेजकर भूजल स्तर को रीचार्ज किया जाता है. इस पानी को बाद में सिचांई के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. आपको बता दें कि इस तकनीक का सफल प्रयोग गुजरात के सरगवा गांव की महिलाओं ने किया. महिलाएं बताती हैं कि पहले बाढ़ के कारण खेतों में सिर्फ एक फसल ही की जा सकती थी. लेकिन इस तकनीक को अपनाने के बाद साल में 2-3 फसलों की उगाही शुरु हुई. इस गांव की महिलाओं ने न सिर्फ अपने खेत के लिए पानी की आत्मनिर्भरता हासिल कर ली बल्की समाज और देश के लिए प्रेरणा बन गई है.

भारत के लिए क्या है आगे की राह !

रिसर्च में विशेषज्ञ बताते हैं कि भारत जैसे देश के लिए जल संकट की समस्या से निजात पाना अकेले तकनीक से संभव नहीं है. रिसर्च में बताया गया कि जब तक किसान, आमजन और नीति निर्धारकों के बीच सहभागिता नहीं होगी तब तक जल संरक्षण तकनीक की सफलता क्षणिक ही रहेगी.

तकनीक को सफल और टिकाऊ बनाने के लिए विशेषज्ञों ने राज्य सरकारों से व्यापक इंप्लिमेंटेशन मैनुअल तैयार करने और किसान सहभागिता को योजनाओं में शामिल करने की सिफारिश की है.

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