Review of “Mother Mary Comes To Me” -An Extravagant Journey.

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अरुणधती रॉय.

ऐसे संस्मरण (memoir) आज के संवेदनहीन समय में सबसे ज्यादा जरूरी हैं, क्योंकि वे हमें हमारी मानवता की याद दिलाते हैं. जब दुनिया विभाजन, असुरक्षा और अविश्वास के दौर से गुजर रही हो, तब ऐसे जीवनवृत्त/ संस्मरण हमें उम्मीद और साहस देते हैं.

एक असाधारण यात्रा –

उनके जीवन में जो कठिनाइयाँ और संघर्ष आए, वही उन्हें आज का व्यक्तित्व बनाने में सहायक बने. उन्होंने जिन चुनौतियों का सामना किया, उन्होंने ही उनके विचारों और लेखन को जन्म दिया. उनका संघर्ष सिर्फ उनकी व्यक्तिगत कहानी नहीं है, बल्कि यह हमें भी संदेश देता है कि कुछ लड़ाइयाँ ऐसी होती हैं जिन्हें अंत तक लड़ना ही पड़ता है. वे हमें दिखाती हैं कि हार या थकान के बावजूद, कुछ संघर्ष मानवता के लिए अनिवार्य होते हैं. स्मरण रहे दुनिया इन्हीं मुट्ठी भर लोगों के कारण है जिन्होंने संघर्ष का रास्ता चुना ताकि मानवता का दिया जलते रहे.

उनकी माँ, मैरी रॉय, का प्रभाव –

अरुंधति अपनी माँ मैरी रॉय के साथ अपने जटिल रिश्ते के बारे में लिखती हैं. यह रिश्ता कहीं प्यार से भरा हुआ है, तो कहीं टकराव से. मैरी रॉय वही महिला थीं जिन्होंने भारतीय ईसाई महिलाओं के संपत्ति में अधिकार की ऐतिहासिक लड़ाई लड़ी थी. इस संघर्ष का असर केवल कानून तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने अरुंधति के जीवन और सोच को भी गहराई से प्रभावित किया. उन्होंने अपने निजी अनुभव साझा किए हैं, जो उनके राजनीतिक दृष्टिकोण और साहस के निर्माण में महत्वपूर्ण रहे.

टकराना जरूरी है –

अरुंधति की सबसे बड़ी पहचान यही है कि उन्होंने अन्यायपूर्ण सत्ता संरचना से टकराने में कभी हिचकिचाहट नहीं दिखाई. यह टकराव केवल उनका व्यक्तिगत साहस नहीं था, बल्कि इससे समाज के अनगिनत लोगों को उम्मीद मिली. उन्होंने यह साबित किया कि जब कोई इंसान अपनी सुविधा, सुरक्षा और प्रतिष्ठा को दाँव पर लगाकर लड़ता है, तो उसका असर बहुत व्यापक होता है. उनकी लेखनी इतनी सजीव और प्रवाहमयी है कि पढ़ते समय लगता है मानो घटनाएँ हमारे सामने घट रही हों.

रिश्तों की परतें –

उन्होंने अपने प्रेम संबंधों और साझेदारियों पर भी खुलकर लिखा है. इन रिश्तों में उनकी अपार प्रेम-क्षमता दिखती है, लेकिन साथ ही यह भी एहसास होता है कि प्यार क्षणभंगुर है. उन्होंने अपने जीवन को किसी एक रिश्ते, एक पेशे या एक पहचान तक सीमित नहीं होने दिया. यही आजादी उन्हें मानवीय बनाती है.उनका जीवन हमें यह समझाता है कि किसी भी इंसान को एक ही भूमिका तक बाँधना अन्याय है.मनुष्य का असली सौंदर्य उसकी स्वतंत्रता और विविध अनुभवों में छिपा है. कृप्या ध्यान दें –

” Freedoom Is Our Existential Right”. You have to pay price for it in this cruel world.

व्यक्तिगत और राजनीति का संगम-

यह किताब केवल संस्मरण नहीं है, बल्कि यह व्यक्तिगत अनुभवों और राजनीतिक सच्चाइयों का गहरा संगम है. अरुंधति का लेखन हमें यह सिखाता है कि राजनीति केवल संसद, कानून या सत्ता की लड़ाई नहीं है. राजनीति हमारे जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों में, हमारे रिश्तों में, हमारे फैसलों में और हमारी स्वतंत्रता में भी मौजूद होती है. जब हम लोकतांत्रीक व्यवस्था में सांसें ले रहे हैं तो स्वाभाविक है कि जीवन के हर पहलु में राजनीति का प्रभाव होता है.

जब पाठक इस किताब को पढ़कर खत्म करता है, तो भीतर एक शांत-सा साहस जगता है. यह साहस बहुत शोरगुल वाला नहीं होता, बल्कि धीमी, लेकिन गहरी ऊर्जा से भरा होता है. यह हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हमारे जीवन की कौन-सी लड़ाइयाँ ऐसी हैं जिन्हें अंत तक लड़ना चाहिए. कई लड़ाइयां ऐसी होती है जिसे हम केवल शांत रहकर ही जीत पाते हैं.

मानवता का स्मरण –

आज के समय में जब लोग जल्दी हार मान लेते हैं, रिश्तों को बोझ मानने लगते हैं, या राजनीति को केवल भ्रष्टाचार से जोड़कर देखते हैं, तब अरुंधति की यह आत्मकथा हमें एक अलग नजर देती है. यह हमें हमारी जड़ों, हमारी इंसानियत और हमारे भीतर छिपी क्षमता की याद दिलाती है. यह बताती है कि इंसान केवल जीतने के लिए नहीं, बल्कि लड़ने के लिए पैदा हुआ है.

स्वंय का अनुभव-

इस किताब को पढ़ते हुए हमें कहीं गुस्सा आता है, कहीं आंसू भी निकलते हैं, और कहीं एक हल्की मुस्कान भी छूट जाती है. भाषा इतनी सरल और साफ है कि आप किताब के पन्नों में खो जाते हैं। यह लेखन आपको सिर्फ पाठक नहीं रहने देता, बल्कि गवाह बना देता है. गवाह एक व्यक्ति और व्यवस्था के टकराव का.

सारांश

यह किताब किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं है , असल में यह हम सबकी कहानी है. संघर्ष में तो हम सभी हैं. हर इंसान के जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब उसे सत्ता, समाज या निजी रिश्तों से टकराना पड़ता है और असली सूरमा तो वही है जो तमाम संघर्षों से जूझते हुए आकाश में ध्रुवतारा के तरह के चमकता है. अरुंधति की कहानी हमें यह विश्वास दिलाती है कि भले ही रास्ता कठिन हो, संघर्ष भरा हो, लेकिन यदि उद्देश्य न्याय और सत्य है, तो अंत तक डटे रहना ही असली जीत है.

कुल मिलाकर बात यह है कि जितना जल्दी हो सके पढ़ डालो. देवियों से विनम्र निवेदन है कि पुस्तक को जरूर पढ़ें ताकि सदियों से भारत में खासकर औरतों और महिलाओं के लिए जो सीमा तय किया गया है समाज नाम के दैत्य द्वारा उसे चुनौती दे पाओ. जन्म और जीवन जिसके लिए मिला है उसको सार्थक कर पाओ. समाज और परिवार के विषय में थोड़ा कम सोचो. नादान लड़की किचन से बाहर निकलकर दुनिया में कूद पड़ो और अपनी अलग पहचान स्थापित करो.

*ध्यान रहे स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने से बचना.

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