कहते हैं कि उम्र सिर्फ एक नंबर है. इस कहावत को सच साबित कर दिखाया है उत्तराखण्ड के 60 वर्षीय किसान जगदीश चंद्र कुनियाल ने. जगदीश कुनियाल के प्रयासों, मेहनत और लगन ने न सिर्फ उनकी बंजर जमीन को पुनर्जीवित किया बल्कि उनके समुदाय में पर्यावरण संरक्षण का एक आंदोलन को भी जन्म दे दिया है. जो जमीन पहले बंजर हुआ करती थी अब हरे-भरे और फलते-फूलते जंगल में तब्दील हो गई है. उत्तराखण्ड के बागेश्वर जिले में बसे सिरकोट नामक शांत गांव में जगदीश रहते हैं. इनकी जीवन गाथा दृढ़ता, समर्पण और पर्यावरण संरक्षण की प्रेरक कहानी है. जगदीश के जुनून और मजबूत इच्छाशक्ति ने न केवल इनके जीवन को बदला बल्कि इनके समुदाय का भी उत्थान किया है. चार दशकों से भी ज्यादा समय से, अनगिनत चुनौतियों, के बावजूद उन्होंने अपनी जमीन को पुनर्जीवित करने, पेड़ लगाने और एक टिकाऊ भविष्य बनाने के लिए अथक परिश्रम किया है.
निराशा से शुरु हुई सफलता की कहानी-
वर्ष 1990 में बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के अपने पिता की विरासत और अपनी परिस्थितियों को बेहतर बनाने के लिए जगदीश ने फलदार पेड़ लगाने का मिशन शुरु किया. शुरुआत में तो उन्हें निराशा हीं हाथ लगी. अमरुद और अखरोट के पेड़ लगाकर शुरुआत की, इस विश्वास के साथ की ये फलदार पेड़ फलेंगे- फूलेंगे और अच्छी उपज देंगे. लेकिन कई प्रयासों के बावजूद ये सफल नहीं हो पाया. द बेटर इंडिया से जगदीश कहते हैं कि मैंने कई प्रयास किए लेकिन पैदावार अच्छी नहीं थी और मुझे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा. मैंने जो पेड़ लगाए थे, वे अच्छी तरह नहीं बढ़ रहे थे और नतीजे निराशजनक थें.
लगातार असफलताओं के बावजूद जगदीश ने हिम्मत नहीं हारी और वे अन्य वृक्ष प्रजातियों के साथ प्रयोग किया जो इस क्षेत्र की कठोर जलवायु को झेल सकती थी. उन्होंने शीशम, देवदार, ओक और बुरांश के पेड़ लगाए. जगदीश के लिए सुखद बात ये थी की पेड़ फल-फूल रहे थें. शुरुआती सालों में जगदीश के काम को संदेह और तीखे विरोध का सामना करना पड़ा. पारंपरिक खेती के आदी गांव वालों ने सिरकोट की पथरीली जमीन पर पेड़ लगाने की समझदारी पर तुरंत सवाल उठा दिए. लेकिन तमाम चुनौतियों के बावजूद जगदीश अडिग रहे और लगातार नए-नए उपाय खोजते रहें. उन्होंने जमीन में और गहराई तक खुदाई की और भूमिगत जल स्त्रोतें तक पहु्ंचे जो उनकी पौधों को जीवित रखने में मददगार साबित हुए. धीरे-धीरे हालात सुधरने लगें. पेड़ बढ़ने लगे और भूमिगत जलस्तर भी बढ़ने लगा. जगदीश कहते हैं कि मेरे प्रयासों से गांव के लोगों को पानी उपलब्ध हुआ. शुरु में लोगों को समझ नहीं आया लेकिन जब उन्होंने पानी का बहाव देखा तो वे मेरी मेहनत की कद्र करने लगें.
चाय की दुनिया में भी रखा कदम-
पेड़ लगाने के सफल प्रयासों के बाद जगदीश ने अपने समुदाय को सशक्त करने और आने वाली पीढ़ियों को स्थाई बनाने के लिए उन्होंने कुछ और बड़ा करने को सोचा. इसीका नतीजा हुआ कि जगदीश चाय की खेती करने लगे. बेटर इंडिया से जगदीश कहते हैं कि मैंने भूमि को बेहतर बनाने और अधिक रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए चाय बागान शुरु किए. अब जगदीश 25 वर्षों से गांव के मजदूरों को सतत रोजगार दे रहे हैं.
मन की बात से मिली नई पहचान-
वर्ष 2021 में जगदीश के जीवन में एक नया मोड़ आया जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मन की बात में उनके काम का जिक्र किया. प्रधानमंत्री मोदी के उनके नाम के जिक्र के बाद न सिर्फ जगदीश बल्कि पूरे गांव में पहचान की बाढ़ आ गई. बेटर इंडिया से जगदीश बताते हैं कि मेरी प्रधानमंत्री के द्वारा प्रंशसा के बाद मेरे गांव के लोगों ने जंगल और पौधों की देखभाल शुरु कर दी. कुछ लोगों ने तो अपनी जमीन पर पेड़ भी लगाने शुरु कर दिए. वे आगे कहते हैं कि मेरे गांव के लोग अब पेड़ लगाने के महत्व को समझते हैं. अब वे पेड़ लगाते भी हैं साथ ही साथ बहुत अच्छे तरीके से पेड़ों की देखभाल करते हैं.
आपको बता दें कि एक लाख से ज्यादा पेड़ लगा दिए हैं. उनका काम पर्यावरण संरक्षण का एक बेहतरीन उदाहरण बन गया है, जो दूसरे को भी अपने समुदायों की सुरक्षा के लिए सक्रिय कदम उठाने के लिए प्रेरित करता है.