खेती से जुड़ी, आजीविका से संवरी, ये है आत्मनिर्भर किसान महिलाओं की कहानी-

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लकी प्लांट्स.

विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से आजकल एक कहानी खूब सुर्खियां बटोर रही है. अगर आप सोच रहे हैं कि यह कहानी ट्रेन्डिंग टॉपिक से है जैसे किक्रेट, बॉलीवुड, पॉलिटिक्स तो आपको एक बार फिर से सोचना चाहिए. ये कहानी आत्मनिर्भरता की तो है ही साथ ही साथ कहानी उस जज्बे, मेहनत और उस हौसले की है जिसे आमतौर पर हमारे समाज में कमतर कर देखा जाता है. यह कहानी एक ऐसी महिला समूह की है जो मिट्टी से जुड़कर और आजीविका मिशन की मदद से आत्मनिर्भरता और सामूहिकता की मिशाल अपने सफलता की कहानी से पेश किया है. मिशन से जुड़कर महिलाएं ने दूध का व्यवसाय बढ़ाया और नए- नए उत्पादों का व्यवसाय स्टार्ट किया जिसके जरिए उन्होंने खुद को आर्थिक तौर पर सशक्त किया है. जरुरी है कि इन महिलाओं की कहानी से हम भी प्रेरित होकर अपने जिन्दगी में आत्मनिर्भरता के बीच बोएं.

कहानी महिला किसान रानी यादव की-

रानी यादव छतरपुर जिले की सिरोंज गांव की रहने वाली है. आपको बता दें कि उनके पति रामनरेश यादव फोटोग्राफी और दूध बेचने का काम करते थे. परिवार की आर्थिक हालत इतनी कमजोर थी की खेती के लिए भी जमीन कम थीं. आपको बता दें कि रानी हमेशा परिवार की आर्थिक स्थिति को लेकर चिंतित रहती है थी. एक दिन गांव की महिलाओं से बातचीत में रानी यादव को आजीविका मिशन की जानकारी मिली थी. इसके बाद रानी समूह से जुड़ गई. उन्होंने सीआरपी, बैंक सखी और सिलाई की ट्रेनिंग लिया. इससे उन्हें नई सिकल्स सिखने को मिली और उनका आत्विश्वास भी बढ़ा. रानी ने पति के दूध व्यवसाय में हाथ बंटाना शुरु किया. रानी ने दूध बिक्री के बढ़ाने के लिए नए तरीके अपनाए, गांव के बाहर भी ग्राहक तलाशें. आपको बता दें कि व्यवसाय बढ़ाने के लिए रानी ने विभिन्न समूहों से लोन भी प्राप्त किया जैसे कि रानी ने आरएफ से 1000 रुपए, सीआरईएफ से 10000 रुपए और बैंक लिंकेज से 3 लाख रुपए का कर्ज लिया.

इतना ही नहीं रानी ने अपने खेती करने के तरीके में भी बदलाव किए. खेती में नई टेक्नोलॉजी अपनाई जिससे फसल उत्पादन में उन्हें काफी बढ़ावा मिला. अब रानी हर महीने 10 से 15 हजार रुपए कमा रही है. अब उन्हें अपने परिवार की आर्थिक स्थिति की चिंता भी नहीं होती है. उनका परिवार अब अच्छे से खुशी-खुशी चल रहा है.

समूह से जुड़कर महिलाओं ने स्टार्ट किया खुद का बिजनेस-

पन्ना विकासखंड के अहिरगुंवा गांव की महिलाएं ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतरर्गत स्वसहायता समूह से जुड़कर विभिन्न गतिविधियों के जरिए आर्थिक और सामाजिक रुप से मजबूत बनी हैं. आपको बता दें कि गांव की 12 महिलाओं के द्वारा वैष्णव माता स्वसहायता समूह के माध्यम से पॉलीहाउस, किराना दुकान, बैंक कियोस्क, मसाला चक्की एवं सब्जी उत्पादन जैसी आजीविका गतिविधियों का संचालन किया जा रहा है.

मीडिया से बात करते वक्त समूह के अध्यक्ष कृष्णा बर्मन ने बताया कि 2016 में परिवार की आय में बढ़ोतरी के लिए किराना दुकान का संचालन किया गया था. इसी कम्र में आवश्यक ट्रेनिंग प्राप्त कर 2024 में छोटी स्तर पर पॉलीहाउस स्थापित कर पपीता का उत्पादन भी स्टार्ट किया.

आपको बता दें कि समूह में शामिल अन्य महिलाओं शिखा, गंगा, मोनभा, संध्या, विद्दा ने बताया कि समूह से जुड़कर सभी महिलाएं आर्थिक और सामाजिक रुप से सशक्त हुई है. साथ ही वे लोग अब अपने परिवार का भरन पोषण आसानी से कर पा रहे हैं. इतना ही नहीं इन महिलाओं में कुछ ऐसी भी महिलाएं हैं जो कम पढ़ी लिखी है, लेकिन इसके बावजूद वे 8-10 हजार रुपए प्रतिमाह बचत कर रही हैं.

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