ईंट निर्माण मानव सभ्यता का सबसे पुराना और आवश्यक उद्योग है. बिना ईंटों के कोई भी भवन या निर्माण कार्य संभव नहीं है. इसका इतिहास लगभग 7,000 ईसा पूर्व मेसोपोटामिया सभ्यता से मिलता है, जहाँ लोग कच्ची मिट्टी की ईंटों से घर और मंदिर बनाते थे. भारत में सिंधु घाटी सभ्यता (2600–1900 ईसा पूर्व) में पक्की ईंटों का प्रयोग बड़े पैमाने पर हुआ. इसके बाद मौर्य, गुप्त और मोगल काल तक ईंटों से बने भवन और स्तूप मिलते हैं.
ईंटें दो प्रकार की होती हैं — कच्ची और पक्की. इन्हें बनाने के लिए चिकनी या कालिमा वाली मिट्टी का प्रयोग किया जाता है. मिट्टी में न बहुत रेत होनी चाहिए और न बहुत चिकनाई. थोड़ा रेत मिलाकर मिट्टी को गूंधा जाता है ताकि ईंटों में दरारें न आएं. आकार देने के बाद इन्हें भट्ठे में पकाया जाता है. इसके लिए कोयला, लकड़ी, बायोगैस या कृषि अवशेषों का उपयोग किया जाता है.
भारत में हर साल अरबों ईंटें बनाई जाती हैं. सिर्फ बिहार में ही लगभग 23 अरब ईंटें प्रतिवर्ष बनती हैं. ईंट निर्माण के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे आगे है. पूरे देश के ईंट उत्पादन का लगभग 65% हिस्सा उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, हरियाणा और पंजाब में होता है. कानपुर, लखनऊ, मुजफ्फरनगर, मेरठ और सूरत जैसे शहर प्रमुख ईंट निर्माण केंद्र हैं.
भारत ईंटों का निर्यात और आयात दोनों करता है. निर्यात के प्रमुख देश हैं — यूके, भूटान, ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, नेपाल, यूएई, सऊदी अरब, इटली और बहरीन. वहीं आयात वियतनाम, चीन, फ्रांस, जर्मनी और इटली से होता है. ईंटों का आयात-निर्यात जहाज, ट्रक और रेल के माध्यम से किया जाता है क्योंकि यह सस्ता और सुविधाजनक होता है.
ईंट उद्योग रोजगार के कई अवसर प्रदान करता है. मजदूर से लेकर मैनेजर तक सभी स्तरों पर काम के मौके हैं. कम निवेश में भी कोई व्यक्ति अपना ईंट भट्ठा शुरू कर सकता है. युवाओं के लिए खासकर ग्रामीण क्षेत्र में ईंट उद्योग में काफी संभावना है.