फलों में केला का सबसे ज्यादा उपयोग हम अपने रोजमर्रा की जीवन में करते हैं. स्पष्ट है कि केला में सबसे अधिक प्रोंटिन पाया जाता है, यह आमतौर पर सस्ता होता है और शरीर को सबसे अधिक ताकत देने वाला फल केला ही है. इसलिए खासकर युवा वर्ग में जो लोग नियमित तौर पर जीम जाते हैं या और भी किसी अन्य तरह के शारीरिक गतिविधियों में लिप्त रहतें उनके लिए केला शरीर को प्रोटिन और ताकत देने के लिए एक बेहतर विकल्प है. इसके अलावा केला भरपूर उपयोग पूजा-पाठ में भी खूब होता है जिसके कारण इसका डिमांड सालों भर बने रहता है. आपको बता दें कि भारत में केला की खेती प्रमुख रुप से कुछ जिलों में होती है जैसे बिहार के हाजीपुर, मधेपुरा, खगड़िया, मध्यप्रदेश का बुरहानपुर तो केले की खेती के लिए काफी प्रमुख है. ऐसे में आप भी यदि केले की खेती करते हैं या फिर करने की सोच रहे हैं तो इस खबर पर आपको गौर करना चाहिए. इस खबर में हम आपको केले की खेती की बारिकियां बताने जा रहे हैं खासकर मानसून के समय में केले के पौधों को किटों से कैसे बचाया ताकि फसल की सफल उपज हो पाए.
केले की अच्छी उपज के लिए अनुकूल जलवायु की जरुरत-
आपको बता दें कि विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जानकार बताते हैं कि केले की फसल के लिए जलवायु और अच्छी जल निकास वाली मिट्टी की जरुरत होती है. केले की खेती के लिए सबसे पहले हमें रोग मुक्त और अच्छी बीजों का चयन करना होता है ताकि फसल अच्छी क्वालिटी की हो. केले के पौधों को नर्सरी में या खेतों में भी लगाया जाता है. जानकार पौधों को उचित दूरी पर लगाने की सलाह देते हैं. जानकार के मुताबिक खेतों में नियमित सिंचाई, पौधों की वृध्दि के लिए खाद का इस्तेमाल और किटों एवं रोगों का समय-समय पर निगरानी केले के अच्छे पैदावर के लिए आवश्यक है.
किटों से ऐसे बचाए केले के पौधों को-
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जानकार बताते हैं कि केले के पौधों को सबसे ज्यादा नुकसान किटों से होता है. रोग की बात करें तो केले के पौधे में आमतौर पर ये चार रोग पाए जाते हैं जैसे कि सिंगोट का रोग, पनामा रोग, ब्लैक सिंगोट का रोग, केले का एफिड और केले का माइंट. इसलिए इन रोगों से फसल को बचाने के लिए इन चार समस्याओं अत्यधिक वर्षा, सूखा, ज्यादा तापमान और तूफान से बचाने का बेहतर उपाय किया जाना चाहिए. किटों और रोगों से बचाने के लिए जानकार बेहतर उपाय के रुप में सलाह देते हैं कि मेड़ों पर पेड़ पौधे लगाए जाएं साथ हीं साथ पौधों के बीच उचित दूरी के बनाए रखा जा. अन्य उपायों कि बात करें तो संतुलत खाद का प्रयोग पौधों को रोगों के प्रति प्रतिरोधी बनाए रखता है. वहीं कई जानकार रैटूनिंग और इंटरक्रॉपिंग अपनाने की सलाह देते हैं.