अभी तक हाशिये पर रहा मखाना आज दुनिया भर में सुपरफूड के नाम से जाना जा रहा है. सरकार ने 2025-2026 के केन्द्रीय बजट में मखाना बोर्ड बनाने का प्रस्ताव दिया है. मखाना बोर्ड बनने का साथ हीं देश में कमोडिटी बोर्ड की संख्या सात हो जाएगी . कॉफी, चाय, रबर,तंबाकू और मसालों के बोर्ड पहले से हैं .
मार्केट में हो रही है मखाना की खुब डिमांड
मखाना जिसे कमलगट्टा भी कहा जाता है , जो पोखर ,झील या ठहरे हुए पानी में खुद उगने वाली कटिदार जलकुंभी का बीज होता है. अभी तक मखाना की वैश्विक बाजार लगभग 12 करोड़ डॉलर की है. खासकर कोविड के बाद जब लोगों इसके इस्तेमाल से होने वाले फायदा का पता चला तब मखाना का डिमांड मार्केट में तेजी से बढ़ रहा है.वीटामीन बी , प्रोटीन ,और फाइबर का उन्नत स्त्रोत होने तथा फैट कम होने के कारण मखाना फिटनेस पर ध्यान देने वालों का पसंदीदा नाश्ता बना जा रहा है . भारत में इसका सेवन सब्जी , मीठे दलिये जैसे अन्य कई व्यंजनों में सेवन किया जाता है.
90 परसेंट मखाना बिहार से
इसे हल्का कुरकुरे बनाकर नाश्ता के लिए और अच्छा बनाया जाता है. देश में करीब 90 परसेंट मखाना बिहार में पैदा होता है .इसमें भी दरभंगा,अररिया,किशनगंज,कटिहार और मधुबनी इसके खास उत्पादक जिले हैं.बिहार के अलावा असम,पश्चिम बंगाल,त्रिपुरा और ओडिशा में इसकी खेती होने लगी है.देश दुनिया में मखाना के बढ़ते मांग से बिहार को कोई खास फायदा अभी तक नहीं हुआ है क्योंकि बिहार में बुनियादी ढ़ांचे की कमी ,मखाना प्रोसेसिंग के लिए सुविधाओं की कमी और मार्केटिंग मीडियम की कमी .बिहार में उगाए जाने वाले ज्यादातर मखाने प्रोसेसिंग और दूसरे कामों के लिए अन्य राज्यों में चला जाता है.इस लिए बिहार में प्रस्तावित मखाना बोर्ड के सामने कई चुनौतियां है. बोर्ड को बेहतर उत्पाद तकनीक लाने के अलावा मार्केटिंग मीडियम ,स्पलाई चैन मैंनेजमेंट और कटाई के बाद प्रोसेसिंग के साथ -साथ pricing पर भी बेहतर तरीके से ध्यान देना होगा.बोर्ड को अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को इस तरह तैयार करना है जिससे इसका व्यापक असर देश और राज्य के विकास पर पड़े.