सोचिए, सिर्फ 20 साल की उम्र और जीवन की दिशा तय करने का साहस. कर्नाटक के मैसूर ज़िले के हरलहाल्ली गाँव के किसान पुत्र अंके गौड़ा ने इसी उम्र में किताबों को अपना जीवन बना लिया. परिणामस्वरूप आज उनके प्रयासों से बनी लाइब्रेरी ‘पुस्तक मने’ (Book House) में बीस लाख से अधिक किताबों का संग्रह है.
कंडक्टर से किताबों के रक्षक तक-
अंके गौड़ा ने अपने करियर की शुरुआत बस कंडक्टर की नौकरी से की थी. लेकिन एक प्रोफ़ेसर की सलाह और ज्ञान की भूख ने उनकी दिशा बदल दी. उन्होंने किताबें इकट्ठा करना शुरू किया. थोड़ी-बहुत नहीं बल्कि ट्रक भर-भर कर. अपनी कमाई का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा उन्होंने किताबों पर खर्च किया. यहाँ तक कि मैसूर का अपना घर भी बेच दिया ताकि और किताबें लाई जा सकें.
30 साल की शुगर फैक्ट्री नौकरी के दौरान उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा भी पुस्तकों पर ही खर्च हुआ.
22 गुंटा ज़मीन पर बना ज्ञान का मंदिर –
उद्योगपति हरी खोड़े के सहयोग से 22 गुंटा जमीन पर फैली इस लाइब्रेरी की पहचान आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही है. यहाँ पाँच लाख से अधिक दुर्लभ विदेशी किताबें, पाँच हज़ार से अधिक शब्दकोश और 1832 तक की पांडुलिपियाँ सुरक्षित हैं.
लाइब्रेरी की अलमारियों में कन्नड़, संस्कृत, अंग्रेज़ी समेत बीस से अधिक भाषाओं की किताबें सजी हुई हैं.
लाइब्रेरी की असली खूबसूरती –
‘पुस्तक मने’ की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सोच है. यहाँ कोई फीस नहीं. कोई सदस्यता नहीं. और न ही कोई रोक-टोक.
चाहे छात्र हों, शोधकर्ता, सिविल सेवा के उम्मीदवार या फिर सुप्रीम कोर्ट के जज—हर कोई यहाँ आकर किताबें पढ़ सकता है और सीख सकता है.
परिवार का त्याग और समर्पण –
अंके गौड़ा की पत्नी विजयलक्ष्मी और बेटा सागर भी इस मिशन में बराबर के सहभागी हैं. यह परिवार लाइब्रेरी की इमारत में ही बेहद सादगी से जीवन जीता है. एक कोने में खाना बनाते हैं. जमीन पर सोते हैं. और दिन-रात किताबों की देखभाल करते हैं.
अब भी 250 से अधिक बोरियों में किताबें पड़ी हैं जिन्हें व्यवस्थित किया जाना बाकी है. परिवार की सबसे बड़ी उम्मीद यही है कि कोई संस्था या व्यक्ति आगे आए और इस खज़ाने को डिजिटल रूप देने में मदद करे ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इससे सीख सकें.
किसान पुत्र की प्रेरक गाथा –
मांड्या ज़िले के किसान परिवार में जन्मे अंके गौड़ा ने यह खजाना अपने लिए नहीं बनाया. उनका सपना हमेशा यही रहा कि ज्ञान सबके पास पहुँचे . उनका कहना है
“ज्ञान हर किसी तक पहुँचे, चाहे वो कोई भी हो.”
भविष्य की चुनौती-
डिजिटल युग में जानकारी हमारी उंगलियों पर है लेकिन लाखों दुर्लभ किताबें अब भी सुरक्षित नहीं हैं. ‘पुस्तक मने’ इस दिशा में एक चेतावनी और प्रेरणा दोनों है. यह बताता है कि ज्ञान केवल संजोने की चीज़ नहीं बल्कि साझा करने की धरोहर है.
निष्कर्ष-
अंके गौड़ा और उनका परिवार इस बात का जीवंत प्रमाण है कि साधारण जीवन जीते हुए भी असाधारण विरासत छोड़ी जा सकती है. उनकी ‘पुस्तक मने’ केवल एक लाइब्रेरी नहीं बल्कि ज्ञान का सच्चा मंदिर है. यह उस सोच का प्रतीक है जो कहती है—
“ज्ञान सबका है और इसे सब तक पहुँचना चाहिए.”