दो बीघे खेत में धान की खेती कर मात्र 2,316 रुपए प्रति माह कमाते हैं बिहार के किसान

Facebook
Twitter
WhatsApp
हरी-भरी धान की खेत.

कहने को तो भारत एक कृषि प्रधान देश है. लेकिन जब हम सरकारी नीतियों की बात करते हैं तो हमारे नीति निर्माता कृषि को प्रधान मानकर नीति नहीं बनाते हैं. ये इस देश की विडंबना है कि आज़ादी के लगभग 77 साल बाद भी हम किसानों को सशक्त नहीं कर पाए हैं. वह किसान जो हमें अन्न देता है उसकी पेट लगभग खाली रह जाती है. किसान का जीवन कर्ज के बोझ से दबा रहता है. जब यह बोझ असहनीय हो जाता है तो वो आत्महत्या कर लेता है.

हाल ही में जब मैं बिहार के किसानों से बात किया तो मैं ये जानकर दंग रह गया कि इतनी कम आय में इनका गुज़ारा कैसे होता है. जब मैं किसानों से बात कर रहा था तो मेरी आंखों में सरकार के झूठे वायदे और संविधान में कल्याणकारी राज्य की अवधारणा की बातें किसी फिल्म की तरह चलने लगीं. मैं मन ही मन सोच रहा था कि आखिर क्या कारण है कि देश की एक बहुत बड़ी आबादी को बहुत ही पॉलिश्ड तरीके से दरकिनार कर दिया गया है. सरकार के कागज़ों में केवल इनका जिक्र आता है. हमारी सरकार किसानों की आय दोगुनी करने की बात करती है लेकिन मेरा प्रश्न यह है कि आय दोगुनी हो भी गई तो इससे किसान आर्थिक रूप से कितना सशक्त हो पाएंगे? क्या सरकार की आय दोगुनी की बात एक खोखला और बिना सोचे-समझे स्कीम बनाने का परिणाम नहीं है? आगे इस रिपोर्ट में आप जान पाएंगे कि क्यों किसानों की आय दोगुनी करने से बात नहीं बनेगी?

भारत और बिहार में कृषि

भारतीय कृषि भारत का सबसे बड़ा आजीविका प्रदाता और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में महत्वपूर्ण योगदानकर्ता है. यह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कृषि भूमि है और देश की लगभग आधी आबादी को रोजगार प्रदान करती है. यह फूड सिक्योरिटी, ग्रामीण रोजगार और सतत प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के लिए आवश्यक है. फिर भी कृषि क्षेत्र के साथ सौतेला व्यवहार होता आ रहा है. किसान करे तो करे क्या — उसकी खेत ही उसकी पूंजी है जो अब उदास है.

बिहार में कृषि की बात करें तो कृषि यहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी है. यहां लगभग 80 प्रतिशत आबादी कृषि पर ही निर्भर है, वहीं सकल घरेलू उत्पाद की बात करें तो कृषि क्षेत्र का योगदान 25 प्रतिशत है. लेकिन जब मैं किसानों से बात किया तो पता चला कि जिस क्षेत्र को अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी बोल रहे वो तो टूट गई है, उसे सर्जरी की आवश्यकता है.

न्यूनतम है न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP)

जब मैं अपने गांव में किसानों से बात करने गया तो किसान सत्येंद्र सिंह अंगिका में पूछते हैं — “हाल चाल हो अमन? बड़ी दिन बाद घर ऐलअ.” तो मैं प्रणाम करते हुए बोला — “सब ठीक-ठाक है. तूं अपन बताव, खेती-किसानी कैसन चल रहल है?”
सत्येंद्र सिंह उदास होकर बोलते हैं — “की बतइए, बस बाप-दादा के जमीन है त ओकरे बचैले हिय.” (पूर्वज की विरासत है, तो उसी को बचा कर रखे हैं.) बात आगे बढ़ी तो मैंने पूछा कि खेती में कौन सी फसल उगाते हैं. सत्येंद्र सिंह बोलते हैं कि मुख्य रूप से चावल और गेहूं की खेती करते हैं. धान के विषय में बताते हैं कि लगभग 150 दिनों में धान की फसल तैयार हो जाती है. बता दें कि सत्येंद्र सिंह के पास 2 बीघा जमीन है और गांव में अधिकांश किसानों के पास इतना ही जमीन है. जिनके पास खुद की जमीन नहीं है, वे छोटे और बड़े किसानों के यहां खेतीहर मज़दूर का काम करते हैं.

धान की खेती का पूरा गणित समझाते हुए सत्येंद्र सिंह और उनके साथ 3-4 किसान जो बाद में हमारी बातचीत में शामिल हुए, बताते हैं कि 1 बीघा जमीन में किसी भी हालत में 30 मन धान (1200 किलो) की फसल की उगाही कर लेते हैं. लागत के विषय में बताते हैं कि अगर खेत में खुद मजदूरी करते हैं तो 1 बीघा में कम से कम 17 से 20 हजार रुपए की लागत आती है. आगे बताते हैं कि सिंचाई के लिए पानी की समस्या नहीं होती है, नहर से पानी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो जाता है.

अगर धान की खेती से सत्येंद्र सिंह का मुनाफा जोड़ा जाए तो उनके पास 2 बीघा जमीन है. इसमें वे बताते हैं कि लागत कम से कम 25,000 रुपए की है. कुल धान की उपज 2 बीघे जमीन में 60 मन यानी 2400 किलो. चूंकि बिहार में एपीएमसी (APMC) मंडी 2006 में समाप्त कर दी गई थी, तो किसानों के पास अपने उपज को बेचने के लिए विकल्प की कमी है. जैसा कि सत्येंद्र सिंह बताते हैं कि वे अपनी उपज सीधे पैक्स (PACs) में बेचते हैं, जो सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बिकता है. बिहार में सरकार ने धान के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य 2200 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया है. इस हिसाब से सत्येंद्र सिंह को 2 बीघे की उपज में 2200×24 = 52,800 रुपए मिलते हैं. अगर लागत घटा दिया जाए तो धान की खेती से सत्येंद्र सिंह को 52,800 – 25,000 = 27,800 रुपए का मुनाफा होता है. प्रति माह आय जोड़ें तो यह 2,316 रुपए होता है. अब कल्पना कर सकते हैं कि इतने कम पैसे में किसान कैसे गुज़ारा करता है.

अगर आय दोगुनी भी कर दी जाए तो क्या किसान के जीवन में कुछ गुणवत्तापूर्ण बदलाव आ सकते हैं? बहरहाल, मैंने बात को आगे बढ़ाते हुए सत्येंद्र सिंह और उनके साथी किसानों से पूछा कि इतने में कैसे आप गुज़ारा कर लेते हैं? सभी लोग सत्येंद्र सिंह की बात से सहमत होकर बोलते हैं — “की करइए, बाप-दाद कर जमीन छै बेच के दिल्ली-बंबई मजदूरी करै जइए.” (क्या करें, बाप-दादा की जमीन बेचकर दिल्ली-मुंबई मजदूरी करने जाएं?) किसान कहते हैं कि बस किसी तरह जीवन कट जाए. इन लोगों से बात समाप्त कर मैं मन ही मन सोच रहा था — रेणु जी जो मैला आंचल का जिक्र किए थे वो आज भी मैला है. यहां की धरती बहुत उदास है, फिर भी किसान उसमें उत्साह और जीवन के बीज बो रहे हैं.

निष्कर्ष

किसानों से बातचीत का सारतत्व यह है कि विश्वगुरु बनने का दावा करने वाला अपना देश आज़ादी के 77 वर्ष बाद भी एक बहुत बड़ी आबादी को हाशिए पर छोड़े हुए है. सरकार की तमाम योजनाओं को झुठलाती किसानों की जमीनी सच्चाई. मैं यह नहीं कह रहा हूं कि सरकारी योजनाएं सारी झूठी हैं, लेकिन यह ज़रूर है कि आज तक ये योजनाएं इन किसानों की पहुंच से बाहर हैं. आखिर किसानों की इस स्थिति का जिम्मेदार कौन है — सरकार, मीडिया या समाज?

अगर सरकार विफल होती है तो मीडिया का यह दायित्व बनता है कि वह जनता की आवाज़ बने. लेकिन मुख्यधारा की मीडिया ने अभी तक इतनी बड़ी आबादी की आवाज़ को दबा कर रखा है. ऐसा नहीं है कि ये आवाज़ नहीं देते हैं, आवाज़ तो ये बिल्कुल देते हैं, लेकिन सरकारें, मुख्यधारा की मीडिया और समाज ने अपनी दीवारें इतनी ऊंची कर ली हैं जिसके कारण इनकी आवाज़ हम तक नहीं पहुंचती है.

आपको बता दें कि ख़बर वाटिका इन्हीं आवाज़ों को ताकत देने का एक मंच है. हम संकल्पित हैं कि पत्रकारिता से जनसामान्य के मुद्दे जो गायब हो गए हैं, उन्हें पुनर्जीवित करना है, ताकि संविधान में किए गए वायदे झूठे और खोखले न जान पड़ें.

Leave a Reply

न्यूज़लेटर सब्सक्राइब करें

मखाना बोर्ड :-क्या है आगे की चुनौतियां ?

क्या है यूनिवर्सल पेंशन स्कीम

कॉलेज ड्रॉपआउट से अरबों डॉलर की कंपनी खड़ा करने की कहानी-

आज का चुनाव विभिन्न परिपेक्ष्य में

क्या होता है loan foreclosure , ऐसे बंद कराएं समय से पहले अपना लोन अकाउंट

ADVERTISEMENT

सिर्फ खबर पढ़ें.

ADVERTISEMENT

सिर्फ खबर पढ़ें.

ख़बर वाटिका
लॉगइन/अकाउंट बनाएं

आपकी गोपनीय जानकारी सुरक्षित है। आपका नंबर या ईमेल केवल अकाउंट वेरिफिकेशन के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।

Or Continue With

New to Khabar Vatika? Register Now!