भारत में राजनीति की शुरुआत को महाजनपद काल से माना जा सकता है. आगे चलकर 16 मुख्य महाजनपदों में मगध आगे बढ़ा और मगध पर नन्द वंश काबिज हुआ . इसी काल में चाणक्य भी थे जिन्होंने नन्द वंश के अंतिम राजा (धनानंद) को हटाने के लिए चरित्र पर प्रहार की नीति प्रारम्भ किया . धनानंद को विलास भोगी राजा कहा गया जो मदिरा पी कर सत्ता पर काबिज था.
यह वाक्य भी बिहार की धरती पर शुरू हुई जो पहले पाटलिपुत्र के नाम से जाना जाता था . आज फिर से प्रशांत किशोर,जिन्हें राजनीति का चाणक्य कहा जाता है, ने चरित्र प्रहार की नीति को शुरू किया है. एनडीए के नेताओं पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप प्रशांत किशोर के द्वारा लगाया गया है जिससे बिहार की राजनीति में खलबली मच गई है.
कब हुई शुरुआत चरित्र प्रहार की राजनीति ?
इसका इतिहास तो प्राचीन काल और मध्य काल में भी था लेकिन हम यहां आधुनिक काल का उदाहरण पर बात करेंगे. देश आजाद नहीं हुआ था . भारत पर अंग्रेज का शासन था और 1857 की क्रांति ने अपना कमाल दिखा दिया था . कुछ ही समय बाद स्थिति बदलनी शुरू हुई और अंग्रेज पर दबाव बढ़ने लगा परिणामस्वरूप भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई.
वैसे तो इसके स्थापना के समय ही द्वंद थे लेकिन ये द्वंद वैचारिक और सैद्धांतिक थे , व्यतिगत नहीं थे. ऐसे सैद्धांतिक और वैचारिक विरोध की प्रवृति कांग्रेस में बनी रही जब तक कांग्रेस का विभाजन नरम दल और गरम दल के रूप में नहीं हुआ था. जैसे ही गरम दल और नरम दल बना और आधुनिक राजनीति में व्यक्तिगत द्वंद शुरू हो गया . व्यतिगत टिपण्णी शुरू हो गई . यहां से चारित्र प्रहार की राजनीति की बीज को बोया गया . इस दौर में तिलक को उपद्रवी और कट्टर कहा गया वहीं नरम दल के नेताओं को कमजोर और अंग्रेज का भक्त कहा गया .
1939 में चरित्र प्रहार का साफ झलक
बात 1938 की थी जब सुभाष जी कांग्रेस के अध्यक्ष निर्विरोध बन गए. लेकिन 1939 में अध्यक्ष पद के लिए विवाद शुरू हो गया और नेताजी को इस्तीफ़ा देना पड़ गया. गांधी जी नरम दल के थे और सुभाष जी गरम प्रवृति के जिसके कारण गांधी जी किए और को अध्यक्ष बनवाना चाह रहे थे लिखने 1939 में फिर से सुभाष जी चुनाव जीत गए. लेकिन चुनाव के बाद गांधी और नेहरू समूह के लोगों ने सुभाष जी पर तानाशाही प्रवृति का आरोप लगाया और सुभाष जी इस्तीफा दे दिए .
वहीं इस समय अंग्रेज के द्वारा गांधी और सुभाष जी पर भी व्यतिगत आरोप मढ़ा गया . गांधी को अंग्रेज में पाखंडी साधु कहा और सुभाष को हिटलर का सार्थक. इसके अलावा भी कई उदाहरण है आजादी से पहले की लेकिन कहानी लंबी नहीं होनी चाहिए .
स्वतंत्रता के बाद चरित्र की राजनीति
स्वतंत्रता के बाद नेहरू जी प्रधान मंत्री बने लेकिन इनके काल में राजनीति नीति आधारित हुई और ना के बराबर ही व्यक्तिगत आलोचना और आरोप देखने को मिलता है .लेकिन नेहरू जी के मृत्यु के बाद जब लाल बहादुर शास्त्री प्रधान मंत्री बने तो उनके ऊपर व्यक्तिगत हमला हुआ और उनके चरित्र पर सवाल खड़ा किया गया. शास्त्री जी को कमजोर और नेहरू की बराबरी नहीं करने वाला कहा गया.
आगे चलकर इंदिरा की काल आई और इंदिरा ने गरीबी हटाओ की नारा लाई और चुनाव जीती लेकिन विपक्ष ने उनपर करारा हमला किया और कहा इंदिरा जनता को बहकाने वाली और तानाशाही प्रवृति वाली है. जब देश में आपातकाल 1975- 77 में लगा तो इंदिरा ने विपक्ष के नेताओं को देश विरोधी और अराजकता फैलाने वाला कही. वहीं विपक्ष ने पूर्ण व्यक्तिगत आरोप मढ़ा और कहा कि इंदिरा गांधी तानाशाही है और लोकतंत्र की दुश्मन है. 1977 के चुनाव में व्यक्तिगत छवि मुद्दा अग्रगणी था .
इंदिरा गांधी के मृत्यु के बाद राजीव गांधी सत्ता में आए लेकिन जल्द ही उनको भी चरित्र की राजनीति में शामिल किया गया . जैसे ही इनके काल में बोफोर्स घोटाला हुआ तो वी पी सिंह ने राजीव गांधी को भ्रष्टाचारी कहकर चरित्र हनन का अभियान चलाया और यहीं से व्यक्तिगत ईमानदारी को हथियार बनाने की शुरुआत हुई.
नरसिंह राव पर भी भ्रष्टाचार और घोटाला का आरोप लगाया गया . बात यहीं तक नहीं रुकी अटल बिहारी बाजपेई को आरएसएस का मुखौटा कहा गया.
चारित्र की राजनीति मनमोहन काल में चरम पर
व्यक्तिगत आरोप की चरम सीमा मनमोहनजी के काल में पहुंच गई और यह काल था 2004- 14. इस दौर में मनमोहन जी को कई तरह के आरोप लगाए गए. मनमोहनजी को कमजोर प्रधानमंत्री के अलावा मौन मोहन भी कहा गया. लेकिन विपक्ष यही तक नहीं रुके और उनको रिमोट कंट्रोल से चलने वाला तक कह दिया.
मनमोहन जी के कम बोलने के स्वभाव को बहुत को राजनीति में उछाला गया और प्रोपेगंडा चला गया जिसका फायदा विपक्ष को मिला.
नरेंद्र मोदी ; सांप्रदायिक मूर्ति
2014 में देश में सत्ता परिवर्तन हुई और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने और अभी भी है . इनके ऊपर भी चरित्र की राजनीति की जाल को बुना गया . इनको विपक्ष के द्वारा तानाशाह कहा जाता है . वहीं इसके अलावा उन पर आरोप लगाया जाता है कि नरेंद्र मोदी सांप्रदायिक और पूंजीपतियों का दोस्त है .
2014 से नेहरू चारित्र का खेल
2014 से भाजपा के द्वारा नेहरू के चरित्र को खंगाला गया और खूब टिप्पणी किया गया. यहां ताकि की संसद में राष्ट्रपति के धन्यवाद प्रस्ताव के भाषण में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा नेहरू के चरित्र को खुले तौर पर बात की गई और उनके चारित्र पर सवाल खड़ा किया गया .
निष्कर्ष
चरित्र की राजनीति कोई नई बात नहीं है . एक लंबी इतिहास है और ढ़ेर सारा उदाहरण पर हुआ है . आज बिहार में वही दोहराया जा रहा है प्रशांत किशोर के द्वारा. ये सही राजनीति की दृष्टिकोण से सही भी है लेकिन तब जब चरित्र का हनन सही में हुए घटना पे हो तो जैसे आज बिहार में सम्राट चौधरी का सबूत के साथ चारित्र उछाला गया है. वहीं अगर चरित्र की राजनीति नेहरू के चरित्र को बिना तर्क के उछाल के हो तो यह लोकतंत्र के लिए सही नहीं है क्योंकि चारित्र की राजनीति प्रोपेगंडा बहुत ही आसानी से लोगों के दिल में घर करती है.
ये लेखक के अपने विचार हैं. इस स्तंभ के लेखक अभयजीत कुमार सिंह है. एडिट अमनदिप के द्वारा किया गया है.