किसी भी फसल की अच्छी उपज के लिए जरुरी है कि उसके बीज गुणवत्तापूर्ण होने चाहिए. बीज कि क्वालिटी अगर बेहतरीन हुई तो उपज भी शानदार होती है. यही कारण है कि कृषि लागत में बीजों का योगदान लगभग 15 परसेंट होता है. आपको बता दें कि आजकल मार्केट विभिन्न प्रकार के बीज उपलब्ध हैं. लेकिन जानकार सलाह देते हैं कि देशी बीजों का उपयोग करना बेहतर पैदावर के लिए उचित होता है क्योंकि ये स्थानीय जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल होता है और इनमें कम पानी और कीट नियंत्रण केमिकलों की जरुरत होती है. देशी बीज स्थानीय कृषि पध्दति के लिए एक बेहतर विकल्प है. ऐसे में देशी बीज की उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए तमिलनाडु के एक युवा किसान ने इसकी संरक्षण करना शुरु किया. आपको बता दें कि इस युवा का नाम सलाई अरुण है. सलाई अरुण बच्चपन में ही अपनी मां को खो दिया था. वे त्रिची में अपने दादा- दादी के घर पल-बढ़े. वे धान, बाजरा और सब्जियां उगाते थे, लेकिन अरुण को खेती से दूर रखते थें क्योंकि वे चाहते थें कि वह अपनी पढ़ाई पर ध्यान लगाए. हालांकि अरुण को खेती करना पसंद था और वह खेती के अलग- अलग तरीके खोजते रहता था. यही कारण है कि अरुण ने विभिन्न प्रकार की सब्जियों के अनेकों बीज इकट्ठा कर लिए हैं. आपको बता दें कि जैविक खेती की सबसे बड़ी आवश्यकता देशी बीज ही होती है. ऐसे यदि आप जैविक खेती करना चाहते हैं या फिर जैविक खेती में आपको रुचि है तो अरुण की कहानी आपके लिए बहुत हीं उपयोगी साबित होगा.
ऐसे पड़ी नए जीवन की बीज-
30 स्टेड्स से अरुण बताते हैं कि 2012 में मैंने कृषि वैज्ञानिक स्वर्गीय जी.नम्मालावार के पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लिया. उस समय मैंने सीखा कि जैविक खेती की कुंजी देशी बीज है. मैंने टिकाऊ कृषि पध्दतियों को बढ़ावा देने के लिए उन्हें संरक्षित करने का निर्णय लिया. आपको बता दें कि इसी कार्यशाला से उन्हें देशी बीज इकट्ठा करने के लिए प्रेरणा मिला और अरुण ने टमाटर, बैंगन, कद्दू, लौकी और अन्य सब्जियों के लगभग 50 प्रकार के बीज इकट्ठा किए. आज अरुण के स्थानीय बीज बैंक में कर्पगाथारु में 300 प्रकार की देशी बीज हैं. इनमें 55 प्रकार के बैंगन, 30 प्रकार के टमाटर, लौकी के 20 प्रकार, तुरई के 15 प्रकार, मक्का के 9 प्रकार, फूलगोभी के 30 प्रकार, 100 प्रकार की फल्लियां और 20 प्रकार की मिर्च शामिल हैं. आपको बता दें कि तमीलनाडु में बैंगन की एक किस्म सिलीगुड़ी बैंगन भी है, जिसे खीरे की तरह खाया जाता है और इसमें कोई कड़वाहट नहीं होती है. इसके अलावा अरुण के पास लौकी की एक किस्म है जो आठ फुट तक बढ़ती है.
यात्राएं कर करते हैं बीज इकट्ठा-
अरुण साल में छह महीने बीज इकट्ठा करने के लिए यात्रा करते थे और बाकी समय दूसरों के खेतों में काम करते लोगों को जैविक खेती का प्रशिक्षण देते या फिर आजीविका के लिए निर्माण स्थलों पर काम करते. 30 स्टेड्स से वे कहते हैं कि 2016 से 2019 में मैंने तमिलनाडु में 70,000 किलोमीटर की यात्रा की और150 के बीज इकट्ठे किए.
तमीलनाडु के अलावा अरुण लगभग 15 राज्यों की यात्रा कर चुके हैं और इन यात्राओं से 300 किस्म के बीज एकत्रित कर लिए हैं. इन यात्राओं की सबसे दिलचस्प बात यह थी कि अरुण के पास यात्रा करने के लिए संसाधन की कमी थी तो लगभग 100 दोस्तों ने उनके साथ मिलकर पैसा इकट्ठा किया और उन्हें एक रॉयल एनफील्ड बाइक खरीद कर दिया.
पूरे भारत में स्पालाई करते हैं देशी बीज-
अरुण पूरे भारत में बीज की स्पालाई करते हैं. बीजों को हवाबंद प्लास्टिक के डिब्बों में रखते हैं. हर पैकेट की कीमत 20 रुपए होती है. हर पैकेट में जैविक बीजों की संख्या किस्म के हिसाब से अलग-अलग होती है. भेजने से पहले इन्हें बटर पेपर में लपेटा जाता है.